चंदन वृक्ष - (Sandal Wood )

चंदन वृक्ष 
भारतीय चंदन (Santalum Album) का संसार में सर्वोच्च स्थान है। इसका आर्थिक और धार्मिक महत्व भी है। यह पेड़ हमारे देश में मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है दक्षिण भारत में चंदन बहुतायत से पैदा होता है।भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं। पेसिफिक चंदन ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पैदा होता है। चीन,मलेशिया और इंडोनेशिया में भी चंदन पाया जाता है। मलयालम, संस्कृत और हिंदी भाषा में इसे 'चंदन' कहते हैं। कन्नड़ में श्रीगंधा और गुजराती में सुकेत। वनस्पति शास्त्री इसे सेंटलम अल्यम कहते हैं जो सेंटलेसी परिवार का सदस्य है। काफी समय तक चंदन का पौधा भारत का मूलवासी माना गया मगर अब वैज्ञानिकों के अनुसार चंदन इंडोनेशिया का मूलवासी है। वहां पर तीन प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं। चंदन के हरे पेड़ में खुशबू नहीं होती है। वास्तव में चंदन के पेड़ की पक्की लकड़ी जिसे हीरा कहा जाता है उसमे ही खुशबू होती है। इस की खुशबू से आकर्षित हो कई बार सांप भी इससे लिपटे मिलते है चंदन की लकड़ी का प्रयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता है। चंदन की लकड़ी का उपयोग नक्काशी के सुंदर काम के लिए भी किया जाता है। नक्काशी से सुंदर, कलात्मक मूर्तियां, खिलौने और दूसरे सजावटी सामान वर्षों से भारत में बनते और बिकते रहे हैं। मैसूर, सागर, भरतपुर और काठियावाड़ में इस हस्तशिल्प के कारीगर आज भी अपना हस्तकौशल दिखा रहे हैं। चंदन चार प्रकार का माना जाता है। सफेद, लाल, मयूर और नाग चंदन

चन्दन वृक्ष की खेती के लिए आवश्यक निर्देश 

चंदन के पेड़ लाल मिट्टी में अच्छी तरह से उगता है। इसके अलावा चट्टानी मिट्टी, पथरीली मिट्टी या चूनेदार मिट्टी में भी ये पेड़ उग जाता है। हालांकि, गीली मिट्टी और ज्यादा मिनरल्स वाली मिट्टी में ये पेड़ तेजी से नहीं उग पाता। अप्रैल और मई का महीना चंदन की बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है। पौधे बोने से पहले अच्छी और गहरी जुताई करनी जरूरी है। अगर आपके पास काफी जगह है तो एक खेत में 30 से 40 सेमी की दूरी पर चंदन के बीजों को बो दें। मानसून के पेड़ में ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें सिंचाई की जरूरत है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इस वृक्ष को उगाने के लिये ढालवाँ जमीन, जल सोखनेवाली उपजाऊ चिकली मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। चंदन के वन में कोई सुगंध या खुशबू नहीं आती है। चंदन के पेड़ में साल में दो बार नई कोपलें, फल और फूल आते है। बरसात के पहले और बरसात के बाद चंदन के पेड़ फलों और फूलों से लदकर पूरे वन को एक नई आभा से युक्त कर देते हैं यह एक सदाबहार पेड़ है जो मूल रूप से परजीवी होता है। इस पौधे की जड़ें हॉस्टोरिया के सहारे दूसरे पेड़ों की जड़ों से जुड़कर भोजन, पानी और खनिज पाती रहती है। चंदन के परपोषकों में नागफनी, नीम, सिरीस, अमलतास, हरड़ आदि पेड़ों की जड़ें मुख्य हैं। चंदन इन पेड़ों के आसपास ही उगते हैं। लेकिन चंदन का पेड़, स्माइक रोग हो जाने पर जल्दी मर जाता है।


चन्दन वृक्ष का धार्मिक और आयुर्वेदिक महत्त्व 

लाल चंदन
अगर घर में चन्दन का पेड़ लगा हो तो घर में कभी वास्तु दोष नहीं होता है और परिवार भी रोगमुक्त रहता हैं घर की पश्चिम या दक्षिण दिशा में चंदन का पेड़ लगाने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। संस्कृत साहित्य में ' लाल चंदन ' का अनेक बार उल्लेख हुआ है। पूजा-पाठ में इसका प्रयोग होता है रक्त चंदन एक अलग जाति का पेड़ है जिसकी लकड़ी लाल होती है लाल रंग का होने की वजह से इसे रक्त चंदन भी कहते हैं  लेकिन उसमे सफ़ेद चंदन की तरह कोई महक नहीं होती लाल चंदन की लकड़ी अन्य लकड़ियों से उलट पानी में तेजी से डूब जाती हैं क्योंकि इसका घनत्व पानी से ज़्यादा होता है यही असली रक्त चंदन की पहचान होती है चंदन के पेड़ों को प्राचीन काल से उनके पीले रंग के अंत:काष्ठ के लिए उगाया जाता रहा है जो दाह संस्कारों और धार्मिक कर्मकांडों में मुख्य भूमिका निभाता था 

अगर आपको सूर्य से संबंधित कोई गृह दोष है तो लाल चंदन की पूजा करें क्योंकि ऐसा करने से आपकी नौकरी में उन्नति का योग भी बनता है। बार-बार धन हानि हो रही है, व्यापार में लगातार घाटा हो रहा हो या आर्थिक संकट बना हुआ है तो गुरु पुष्य नक्षत्र के एक दिन पहले चंदन के पेड़ की जड़ पर चावल, जल अर्पित करें और धूप-दीप दिखाकर आमंत्रण दें आएं। दूसरे दिन यानी गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन उस पेड़ की एक छोटी सी लकड़ी लाकर एक लाल कपड़े में बांधकर घर के मुख्य द्वार के बीच में टांग दें। इससे आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार आने लगेगा। 'चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग' अर्थात चन्दन के पेड़ में शीतलता के कारण विषधारी सर्प लिपटे रहते है किन्तु चन्दन के वृक्ष पर सर्पो के विष का प्रभाव नहीं पड़ता है। यह चन्दन की विशेषता है। आयुर्वेद में चंदन को शीतल, शक्तिवर्धक, दंतक्षयनाशक और शरीर को शक्ति देने वाला माना गया है। कहा जाता है की देवलोक में भी चंदनासव, चंदन का शरबत आदि पिया जाता है। स्त्रियों के आलेपन, शृंगार, सुगंध और प्रसाधन के लिए चंदन का उपयोग ईसा के दो हजार वर्ष पूर्व से ही होता रहा है। आयुर्वेद में तमाम तरह की औषधियां बनाई जाती हैं चंदन के चूर्ण को कुछ विशेष तरह के पदार्थों में मिलाकर आयुवृद्धि की औषधियां बनाई जाती हैं ह्रदय रोग, त्वचा के रोग और मानसिक रोगों में चंदन के तेलों का खूब प्रयोग होता है सुगंध चिकित्सा और पंचकर्म में भी चंदन का प्रयोग किया जाता है



पूजा के हर कार्य में चन्दन की लकड़ी, चंदन का लेप और चंदन के इत्र का प्रयोग किया जाता है लोग अक्सर घर से निकलने से पहले या किसी धार्मिक काम में तिलक जरूर लगाते हैं. अक्सर लोग कुमकुम का तिलक लगाते हैं.वहीं कुछ लोग चंदन का टीका भी लगाते हैं नजरदोष से बचने के लिए रोज चन्दन का तिलक लगाना चाहिए इस तिलक को लगाने से मन को शांति मिलती है पीले चंदन का इस्तेमाल आम तौर वैष्णव मत को मानने वाले करते हैं जबकि रक्त चंदन शैव और शाक्त मत को मानने वाले अधिक प्रयोग करते हैं नियमित चन्दन का तिलक लगाने से आज्ञाचक्र सक्रिय हो कर शुभ फल देता है प्राचीन काल से ही शिवलिंग का अभिषेक भी चंदन से करने की परंपरा पाई जाती तिरुपति बालाजी के पूजा विधान ने हजारो सालो से चन्दन की लकड़ी का इस्तेमाल हो रहा है इस मंदिर को पूजा के लिए आने वाले समय में चन्दन नियमित रूप से मिलता रहे सिर्फ इसलिए तिरुपति बालाजी मंदिर ट्रस्ट अब चन्दन की खेती भी करता है बौद्ध धर्म में चंदन के प्रयोग से ध्यान करने की परंपरा बताई गई है चंदन की बनी अगरबत्तियां आपको कई बौद्ध मठो में जलती मिल जाएगी 

चन्दन वृक्ष का आर्थिक महत्त्व 


आमतौर पर किसान अपने बगीचों या खेतों के किनारे फलों के पेड़ लगाते हैं, ताकि सीजन आने पर उन्हें बेचकर मुनाफा कमाया जा सके। उनके लिए चन्दन का पेड़ एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है चंदन वृक्ष लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है। उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है। एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है। चन्दन वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सुगन्धित तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। तने की नरम लकड़ी तथा जड़ को जड़, कुंदा, बुरादा, तथा छिलका बेचा जाता है। इसकी लकड़ी का उपयोग मूर्तिकला, तथा साजसज्जा के सामान बनाने में और अन्य उत्पादनों का अगरबत्ती, हवन सामग्री, तथा सौंदर्य प्रसाधन के निर्माण में होता है। प्राचीन आसवन विधि द्वारा चन्दन की लकड़ी से सुगंधित तेल निकाला जाता है भारत में चंदन का तेल सौंदर्य प्रसाधन के रूप में मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, कन्नौज, लखनऊ, कानपुर आदि में खपता है। लगभग संपूर्ण तेल सौंदर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त होता है। एक किलो तेल लगभग दो हजार रुपए में बिकता है और इसके निर्यात से प्रतिवर्ष करोड़ो रुपया प्राप्त होता है। आमतौर पर चंदन की लकड़ी 6 से 7 हजार रुपए प्रति किलो की दर से बिकती है अगर क्वालिटी अच्छी हो तो 10 हजार रुपए किलो तक दाम आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन बड़ा हो जाने पर चोरी के भय से चन्दन वृक्ष की सुरक्षा करना अति आवयशक हो जाता है चंदन की लकड़ी की अवैध तस्करी से चन्दन के पेड़ तेजी से कम हो रहे है 


हमारे देश में लगभग सभी धर्मो के प्राचीन साहित्य,पुराण और ग्रंथो में चन्दन की लकड़ी का वर्णन मिलता है मैसूर के राजा टीपू सुल्तान ने 1792 में ही चंदन को 'राज वृक्ष ' घोषित कर दिया था। भारत में लगभग आठ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में चंदन की खेती होती है। बहुमूल्य वृक्ष होने के कारण अब तो इसकी खेती करने वाले किसानो के लिए बीमा की भी सुविधा उपलब्ध है हम बेशकीमती उत्तम चंदन की लकड़ी उत्पादन कर विदेशी मुद्रा भी कमा सकते है लेकिन अफ़सोस आज भी चन्दन की खेती के प्रति सरकारी रवैया उदासीन है धड़ल्ले से होती तस्करी और चोरी के कारण चन्दन के वृक्ष तेज़ी से घट रहे है वास्तव में चंदन हमारी संस्कृति का अंग रहा है। इसे सरकारी संरक्षण मिलना ही चाहिए। तभी ये बहुमूल्य वृक्ष लुप्त होने से बच पायेगा 

ब्रह्मकमल - ( Brahma Kamal )

ब्रह्मकमल
हिमालय की वादियों में एक ऐसा फूल भी है जो 14 साल में एक बार खिलता है। इसका नाम है ब्रह्मकमल। यह फूल तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर सिर्फ रात में खिलता है। सुबह होते ही इसका फूल बंद हो जाता है। इसे देखने दुनियाभर से लोग वहां जाते है। हाल ही ब्रह्मकमल की तस्वीर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने भी जारी की है। इसे उत्तराखंड का 'राज्य पुष्प ' भी कहते हैं। ब्रह्मकमल को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस। ब्रह्म कमल का वानस्पतिक नाम : Saussurea obvallata है ये एस्टेरेसी कुल का पौधा है। सूर्यमुखी, गेंदा, डहलिया, कुसुम एवं भृंगराज इस कुल के अन्य प्रमुख पौधे हैं।आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में भी इस फूल में कई औषधीय गुण हैं।

ब्रह्मकमल से जुड़ी पौराणिक  बातें

यह लंबे समय से विश्वास है कि अगर जो कोई भी इस दुर्लभ फूल को खिलते हुए देखता है,उसकी सारी इच्छाएं पूरी होती है। लेकिन इसे खिलते देखना आसान नहीं है क्योंकि यह देर शाम या रात को खिलता है और केवल कुछ घंटों तक ही खिला रहता है। गणेश जी के पुनः जन्म की कथा बड़ी लोकप्रिय है। इसमें भी ब्रह्मा कमल का जिक्र आता है कहा जाता है पार्वती के अनुरोध पर ब्रह्मा ने ब्रह्मा कमल का निर्माण किया, जिनकी सहायता से भगवान शिव ने एक हाथी के सिर को गणेश के शरीर पर रखा। जब शिव ने गणेश के शरीर पर एक हाथी के सिर को जोड़ा तो ब्रह्मा कमल से पानी छिड़क कर उन्हें नहलाया गया था यही कारण है कि इस कमल को देवताओं को जीवन-देने वाले फूल की संज्ञा दी भी गई है ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा को हमेशा एक विशाल कमल पर बैठा दिखाया जाता है ये 'ब्रह्मा कमल' का ही सफ़ेद फूल है ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि से पैदा हुए थे जबकि कुछ अन्य पुराण कहते हैं कि वह एक विशाल सफेद कमल से पैदा हुए थे जिसे ब्रह्मा कमल कहते हैं। महाभारत में भी इस फूल का जिक्र आता है जब पांडव जंगल में निर्वासन में थे तो द्रोपदी इस फूल को देख कर अपने साथ हुए अपमान को कुछ देर के लिए भूल गई थी इसी प्रकार रामायण में जब लक्ष्मण को संजीवनी बूटी दी गई गई तो वो चमत्कारिक रूप से पुनर्जीवित हो उठे इससे खुश हो भगवान राम पर देवताओं ने स्वर्ग से पुष्प वर्षा की पृथ्वी पर जहाँ भी ये पुष्प गिर गए वहां ये फूलों की घाटी के रूप में उग आये और 'ब्रह्मा कमल ' कहलाये
 

 बेहद ठंडे इलाकों में मिलता है ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल हिमालय के उत्तरी और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है। यह ब्रह्मकमल हिमालय के बेहद ठंडे इलाकों में ही मिलता है। बदरीनाथ, केदारनाथ के साथ ही फूलों की घाटी, हेमकुंड साहिब, वासुकीताल, वेदनी बुग्याल, मद्महेश्वर, रूप कुंड, तुंगनाथ में ये फूल मिलता है। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्मकमल को भगवान महादेव का प्रिय फूल है। इसका नाम उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा के नाम पर दिया गया है।

चीन में भी खिलता है, कहते हैं तानहुआयिझियान

ब्रह्म कमल सुंदर, सुगंधित और दिव्य फूल कहा जाता है। वनस्पति शास्त्र में ब्रह्म कमल की 31 प्रजातियां बताई गई हैं। चीन में भी ब्रह्म कमल खिलता है जिसे  'तानहुआयिझियान' कहते हैं जिसका अर्थ है प्रभावशाली लेकिन कम समय तक ख्याति रखने वाला। इसका वानस्पतिक नाम 'साउसुरिया ओबुवालाटा' है। साल केवल जुलाई-सितंबर के बीच खिलने वाला यह फूल मध्य रात्रि में बंद हो जाता है। ब्रह्म कमल को सुखाकर कैंसर रोग की दवा में उपयोग किया जाता है।

 
केदारनाथ धाम में ब्रह्म वाटिका में भी इसकी रौनक

केदारनाथ में पुलिस ने ब्रह्मवाटिका बनाई है वहां भी ये फूल खिले हैं। ख़ास बात है कि संभवतः इंसान की बनाई औषधीय गुणों के कारण संरक्षित प्रजाति में रखा गया है पहली वाटिका है जिसमें ब्रह्मकमल खिले हैं। यह सूरजमुखी की फैमिली एस्टिरेसी का पौधा है। केदारनाथ पुलिस के मुताबिक इस वाटिका को तैयार करने में करीब तीन साल लगे थे। इसकी सुंदरता और औषधीय गुणों के कारण ही इसे संरक्षित प्रजाति में रखा गया है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में ब्रह्मकमल को काफी मुफीद माना जाता है। यह भी कहा जाता है घर में भी ब्रह्मकमल रखने से कई दोष दूर होते हैं।
 

उत्तराखंड में बनेगा ब्रह्मकमल का बीज बैंक


वन अनुसंधान केंद्र ने राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का बीज बैंक तैयार कर लिया है। यह दुर्लभ फूलों को बचाने के लिए शुरू की गई मुहिम के तहत किया गया है। इसके तहत चमोली जिले के रुद्रनाथ औैर मंडल वन प्रभाग में तीन-तीन हेक्टेयर में पौधशाला तैयार हो गई है। वन अनुसंधान केंद्र ने विश्व की धरोहर में शामिल चमोली के फूलों की घाटी में पाए जाने वाले राज्य पुष्प ब्रह्मकमल, हत्था जड़ी, ब्लू लिली समेत अति दुर्लभ किस्म के दो दर्जन से ज्यादा प्रजातियों के फूलों को संरक्षित करने से की गई हैं।

नारियल - (Coconut )

नारियल 

माना जाता है कि नारियल का इंग्लिश नाम 'कोकोनट ' 16 वी  सदी में पुर्तगाली नाविकों ने दिया उन्होंने नारियल की तीन आँखो  को देखा तो उसका नाम कोको रख दिया क्योकि यह देखने में इंसान के चहरे से मिलता -जुलता था कोको का पुर्तगाली में मतलब होता है मुस्कुराता हुआ चेहरा बाद में इसमें नट  शब्द जोड़ दिया गया अपने देश में सबसे ज्यादा नारियल तमिलनाडु ;केरला ;कर्नाटका ;आंध्रप्रदेश में पैदा होता है 

नारियल की 3 स्टेज होती है

1.  कच्चा या पानी वाला नारियल 

यह नारियल की शुरुआती स्टेज होती है इसे डाब या इंग्लिश में टेंडर कोकोनट कहा जाता हैं पोलिनेशन के करीब 9 महीने बाद पानी वाला नारियल तैयार हो जाता है कई बार इसमें पानी के अलावा हल्की मलाई भी होती है इसे पीना बहुत फायदेमंद है

फायदे 

यह एक शुद्ध ड्रिंक है जिसमे किसी तरह की मिलावट नहीं होती इसमें मौजूद इलेक्ट्रोलाइट उसी अनुपात में है जैसे हमारे शरीर में होते है डी -हाइड्रेशन या दस्त आदि में निम्बू -चीनी के घोल से भी ज्यादा फायदेमंद है नारियल पानी इसमें मौजूद पोटैशियम और मैग्नीशियम ब्लड सर्कुलेशन ,हार्ट से लेकर मसल्स आदि तक के लिए अच्छे है यह माइक्रोबियल है जो पेट में मौजूद यीस्ट ग्रोथ को खत्म करता है ,जिसमे मुहासे हटाने और इम्युनिटी बढ़ाने में   मदद मिलती है यह पेट में मौजूद कीड़ो को मारने का काम करता है एक्सरसाइज या मेहनत का काम करने के बाद नारियल पानी पीने से पसीने से निकलने वाले साल्ट्स की भरपाई होती है इसमें कुदरती मीठापन होता है इसलिए शुगर के मरीज भी ले सकते है थकान होने पर भी इसे पीना फायदेमंद है क्योकि यह एनर्जी का है शरीर को ठंडा रखता है लू लगने पर मरीज को देना फायदेमंद है यूरिनरी ट्रक इन्फेक्शन सेअच्छा सोर्स है इसे पीकर तरोताजा भी हो जाते हैं यह आसानी से पच जाता है इसलिए छोटे बच्चो को भी दे सकते  है लड़ने में मददगार हो सकता है किडनी के स्टोन को निकालने मे भी मददगार साबित हो सकता है 

नुकसान 

डायलिसिस स्टेज पर पहुंच चुके किडनी के मरीजों ,यानि जिन्हे डॉक्टर ने लिमिट में पानी पिने की सलाह दी है उन्हें इससे परहेज करना चाहिए लोग यह सोचकर खूब सारा नारियल पानी पीते है कि इसमें कैलोरी नहीं होती ,जबकि एक कप (250 मि.ली )नारियल पानी में करीब 45 -50 कैलोरी होती है दिन भर में दो नारियल पानी तक ही लिमिट रहे तो बेहतर है कुछ लोग कहते है कि यह सम्पूर्ण भोजन है ;जोकि सही नहीं है इसमें प्रोटीन कम मात्रा में होता है और फाइबर लगभग नहीं होता पानी के साथ -साथ निम्बू पानी ,छाछ आदि तो भी डाइट में शामिल करे इसके भी अपने फायदे है नेचुरल नारियल पानी ही पिए ;पैक्ड नारियल पानी फायदेमंद नहीं है इमें कई तरह की चीजे जैसे कि  प्रीजर्वेट, शुगर, फ्लेवर आदि मिलते हैं।

कब और कितना पिए 
वैसे नारियल पानी कभी भी पी सकते है फिर भी खाली पेट पीना ज्यादा फायदेमंद है  साथ ही दो भोजन के बीच स्नैक्स की तरह ले सकते है खाने के साथ न ले 

2.गिरी वाला या जटा वाला नारियल 

डाब के बाद गिरी वाला नारियल बनता है इसमें पानी की मात्रा काफी कम हो जाती है और बड़ जाता है पोलिनेशन के करीब 12 महीनो में नारियल में गिरी तैयार हो जाती है इसे शुभ कामों आदि में इस्तेमाल किया जाता है फैट की मात्रा बढ़ जाने से इसे कम मात्रा में खाने की सलाह दी जाती है 

फायदे 
इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर,विटामिन और मिनरल होते है यह एंटी - बैक्टीरियल और एंटी -वाइरल है फाइबर ज्यादा होने से पाचन से जुड़ी गड़बड़ियों में फायदेमंद है फ़ौरन एनर्जी देने से दूध पिलाने वाली माओं के लिए लाभदायक बढ़ते बच्चो के लिए भी अच्छा है 

नुकसान 
इसमें फैट ज्यादा होता है इसलिए वजन बढ़ने की आशंका होती है सैचुरेटेड फैट ज्यादा होने से दिल के लिए खतरा बढ़ता है यह कम एक्सरसाइज करने या बैठ कर काम करने वाले लोग इसे कम मात्रा में और कभी -कभी ले

3 सूखा नारियल या खोपरा:

इसे गोला भी कहते हैं। यह नारियल की तीसरी स्टेज होता है। पानी में नहीं होता है। मुख्य रूप से यह तेल निकालने के लिए उपयोग होता है। मिठाई आदि में भी स्वाद वृद्धि के लिए इसे इस्तेमाल किया जाता है। इसमें फैट की मात्रा काफी ज्यादा होती है, इसलिए इसके सेवन कम करना चाहिए।

गिरी या खोपरा, क्या बेहतर?

 
नारियल की गिरी में हल्का मॉइस्चर भी होता है, जबकि सूखे नारियल में तेल बहुत ज्यादा होता है। गिरी और खोपरा में फाइबर अच्छी मात्रा में होता है। फिर भी गिरी कम मात्रा में ही खानी चाहिए क्योंकि इसमें फैट काफी होता है। सूखा नारियल और भी कम मात्रा में खाना चाहिए क्योंकि इसमें शामिल है सैचुरेटिड फैट काफी ज्यादा होता है। हां, मिठाइयों में स्वाद वृद्धि के लिए कम मात्रा में इसका उपयोग कर सकते हैं। दूध पिलाने वाली मांओं के लिए लड्डू आदि भी बना सकते हैं। हालांकि खोपरे की तासीर गर्म मानी जाती है इसलिए यह गर्मियों में कम खाना चाहिए

12 साल में एक बार खिलता है केरल का दुर्लभ 'नीलकुरिंजी ' फूल

नीलकुरंजी
 भारत की आज़ादी की 72वीं सालगिरह पर जब प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण शुरू किया तो शुरुआत में एक फूल का ज़िक्र किया, जो अब चर्चा का विषय बन गया मोदी ने कहा,..... ''हमारे देश में 12 साल में एक बार नीलकुरंजी का पुष्प उगता है इस वर्ष दक्षिण की नीलगिरि की पहाड़ियों पर नीलकुरंजी का पुष्प जैसे मानो तिरंगे झंडे के अशोक चक्र की तरह देश की आज़ादी के पर्व में लहलहा रहा है.''

कुरंजी और नीलकुरंजी का वैज्ञानिक नाम Strobilanthes kunthianus है ये दक्षिण भारत के वेस्टर्न घाट के शोला जंगलों में पाया जाता है नीलगिरि हिल्स का मतलब है 'नीले पहाड़ 'और इसे ये नाम इसी फूल की वजह से मिला है देखने पर ऐसा लगता है की मानो जैसे नीले आसमान के नीचे पर्वत पर नीले रंग की चादर बिछ गई हो। ये फूल असल में 12 साल में एक बार खिलता है और उस साल पर्यटकों की भीड़ रहती है इस फूल के साल 1838, 1850, 1862, 1874, 1886, 1898, 1910, 1992, 1934, 1946, 1958, 1970, 1982, 1994, 2006 और 2018 में खिलने की जानकारी है कुछ कुरंजी फूल ऐसे हैं जो हर सात साल में खिलते हैं और फिर मर जाते हैं वनस्पति विशेषज्ञों की के अनुसार यह फूल एक बार खिलने के बाद सूखने लगते हैं, जिसके बाद ये अपने बीज उसी स्थान पर गिरा देते हैं। ये जान कर आप हैरान हो सकते है की तमिलनाडु के पलियान समुदाय के लोग इस फूल को अपनी उम्र का आकलन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं नीलकुरंजी फूल 1300 से 2400 मीटर की ऊंचाई पर खिलते हैं और इसका पौधा 30-60 सेंटीमीटर ऊंचा होता है हालांकि ये कुछ मामलों में 180 सेंटीमीटर तक भी चला जाता है एक वक़्त था जब नीलगिरि और पलानी हिल्स की सारी पहाड़ियां कुरंजी फूलों की चादर से ढकी रहती थी लेकिन अब दूसरे पेड़-पौधे और इंसानी आबादी वो जगह घेरती जा रही है ज़ाहिर है, जैसा कि इस फूल के नाम से ज़ाहिर होता है, ये नीले रंग का होता है साल 2018 में मुन्नार में ये फूल उगा है और इसे देखने हज़ारों लोग पहुंच रहे हैं केरल की सरकार ने बाकायदा keralatourism.org वेबसाइट पर इस जानकारी को अपलोड़ किया है नीलकुरंजी की 40 क़िस्में होती हैं. इनमें से ज़्यादातर नीले रंग की होती हैं फूल के नाम में नील के मायने नीले रंग से हैं और कुरंजी इस इलाके के आदिवासियों की तरफ़ से इस फूल को दिया नाम है

इस सीजन में पूरा मुन्नार नीला-पर्पल हो जाता है
सिर्फ मुन्नार ही नहीं कर्नाटक के वेस्टर्न घाट और तमिलनाडु के नीलगिरी पर्वत पर भी हर 12 साल में नीलकुरिंजिनी के फूल खिलते हैं कर्नाटक में बेल्लारी जिले की संदूर पर्वत श्रृंखला भी अगस्त के बाद से ही नीलकुरिंजिनी के फूलों से भर गई है इसके आलावा तमिलनाडु की नीलगिरी पर्वत श्रृंखला का नाम भी इन्हीं फूलों के चलते पड़ा है बताया जाता है कि तमिल में 2000 साल पहले लिखी गई कविताओं में भी इन फूलों का ज़िक्र आता रहा है. फिलहाल भारत में इन फूलों की करीब 46 प्रजातियां पाई जाती हैं ये फूल पर्पल के आलावा नीले, हरे और लाल रंग में भी मिलते हैं दुनिया भर में नीलकुरिंजिनी की 240 प्रजातियां पाई जाती हैं फिलहाल मुन्नार में नीलकुरिंजिनी का सीजन शुरू हो गया है जो अगली सर्दियों तक चलेगा.
  

साल 2006 में पिछली बार खिला ये फूल इस साल अगस्त 2018 में खिला है और इस पर अक्टूबर तक बहार रहेगी केरल में मुन्नार में कोविलूर, कदावरी, राजामाला और इरावीकुलम नेशनल पार्क में इन फूलों से गज़ब का माहौल बना है और देश विदेश से इसे देखने पर्यटक खींचे चले आते है केरल का इरविकुलम नेशनल पार्क जहाँ से फूल खिले है मुख्यत: यहां पाई जाने वाली दुर्लभ नीलगिरि तहर ( जंगली बकरी ) के लिए भी जाना जाता है।

अगर आप नीलकुरिंजी की खूबसूरती के कायल हो गये हैं तो जल्दी कीजिए ये इसे देखने का सही वक्त है। अगर अभी नीलकुरिंजी को नहीं देखा तो ये मौका अब 12 साल बाद ही आएगा। नीलकुरिंजी जहां खिलता है उसे देखने के लिए आपको टिकट खरीदना पड़ेगा। केरल टूरिज्म की ओर से नेशनल पार्क के लिए टिकटों की बिक्री ऑनलाइन भी हो रही है। आप चाहें तो www.eravikulam.org पर जाकर ऑनलाइन टिकट बुक कर सकते हैं। व्यस्कों के लिए 120 रुपये, बच्चों के लिए 90 रुपये जबकि विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की कीमत 400 रुपये है। इसके अलावा साधारण कैमरा के लिए 40 रुपये जबकि वीडियो कैमरा के लिए 315 रुपये देने होंगे। इस बार पर्यटकों की संख्या 3500 प्रतिदिन सीमित की गई है। पिछली बार साल 2006 में जब नीलकुरिंजी फूल खिले थे तो उस वक्त इसे देखने के लिए देश-विदेश से 3 लाख से भी ज्यादा पर्यटक मुन्नार पहुंचे थे। केरल टूरिज्म के अनुमान के मुताबिक, इस बार पर्यटकों की संख्या करीब 8 लाख तक पहुंच सकती है।

श्वेतार्क ( सफेद आक ) का पौधा - ( Calotropis Gigantea)

 श्वेतार्क (Calotropis Gigantea) एक औषधीय पादप है इसको मंदार', आक, 'अर्क' और अकौआ भी कहते हैं। यह पौधा जहरीला होता है आंकड़े के पौधे से सफेद दूध भी निकलता है गर्मियों के दिनों में प्रायः अनेक स्थानों पर श्वेतार्क के बीज उड़ते हुए दिखाई देते हैं। साधारण सी भाषा में इनकों 'बुढ़िया के बाल ' कह देते हैं। इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है। पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे होते हैं। हरे सफेदी लिये पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन चित्तियाँ होती हैं। फल आम के तुल्य होते हैं जिनमें रूई होती है। आक गर्मी के दिनों में रेतिली भूमि पर होता है। चौमासे में पानी बरसने पर सूख जाता है।अर्क इसकी तीन जातियाँ रक्तार्क,श्वेतार्क,राजार्क पाई जाती है इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि आक का पौधा विषैला होता है यह मनुष्य को मार डालता है। इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योंकि आयुर्वेद संहिताओं में भी इसकी गणना उपविषों में की गई है। यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उलटी दस्त होकर मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, चतुर वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बड़ा उपकार होता है।औषधीय उपयोग में केवल सफ़ेद आक का ही उपयोग करना चाहिए. नीली प्रजातियाँ अधिक विषैली होती हैं और उनका उपयोग खाने में नहीं किया जाता, केवल बाह्य उपयोग ही किया जाता है आक का हर अंग दवा है, हर भाग उपयोगी है। यह सूर्य के समान तीक्ष्ण तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायनधर्मा हैं। कहीं-कहीं इसे 'वानस्पतिक पारद' भी कहा गया है।


श्वेतार्क का चिकित्सा में उपयोग

आक के पीले पत्ते पर घी चुपड कर सेंक कर अर्क निचोड कर कान में डालने से आधा सर दर्द जाता रहता है बहरापन दूर होता है। दाँतों और कान की पीडा शाँत हो जाती है।

आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है। आक के फूल को जीरा, काली मिर्च के साथ बालक को देने से बालक की खाँसी दूर हो जाती है।

बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जाते रहते हैं। बर्रे काटे में लगाने से दर्द नहीं होता। चोट पर लगाने से चोट शाँत हो जाती है। जहाँ के बाल उड गये हों वहाँ पर आक का दूध लगाने से बाल उग आते हैं।

आक की जड का धूँआ पीने से आतशक (सुजाक) रोग ठीक हो जाता है। इसमें बेसन की रोटी और घी खाना चाहिये। और नमक छोड़ देना चाहिये। आक की जड और पीपल की छाल का भस्म लगाने से नासूर अच्छा हो जाता है। आक की जड का चूर्ण का धूँआ पीकर ऊपर से बाद में दूध गुड पीने से श्वास बहुत जल्दी अच्छा हो जाता है।

अगर आपकी एक आंख में पीड़ा हो रही हो तो जिस आंख में पीड़ा हो रही हो उसके दूसरे पैर के अंगूठे पर श्वेत यानि सफेद आक को दूध से पूरी तरह गीला करके कुछ देर रखने से काफी राहत मिलती है


 श्वेतार्क  का तंत्र शास्त्र में महत्त्व 

यदि किसी व्यक्ति को अपने शरीर की रक्षा नकारात्मक शक्तियों से, बीमारियों से, बुढ़ापे की परेशानियों से करनी हो तो उसे आंकड़े के पौधे का यह उपाय अपनाना चाहिए। उपाय के अनुसार आंकड़े के पौधे की जड़ का एक छोटा सा टुकड़ा गले में ताबीज के साथ धारण करना चाहिए। ध्यान रखें ताबीज के लिए काले धागे का प्रयोग करें। मार्केट में कई प्रकार के ताबीज आसानी से मिल जाते हैं। अत: उस ताबीज में आंकड़े की जड़ को डालकर धारण करें। इस उपाय से आपके शरीर की रक्षा होगी, क्योंकि यह ताबीज किसी कवच के समान काम करेगा यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से परेशान है तो वह रवि पुष्य के दिन आंकड़े एवं अरण्ड की जड़ निमंत्रण देकर तोड़कर ले आएं। जड़ तोडऩे से पहले जड़ को निमंत्रण दें कि आप हमारे साथ चलिए। इसके बाद घर पर इन जड़ों को गंगाजल से धोएं, सिंदूर आदि पूजन सामग्री अर्पित कर पूजन करें। पूजन के दौरान श्रीगणेशाय नम: मंत्र का जप 108 बार करें। शास्त्रों अनुसार आंकड़े के फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यह प्रायः मन्दिरों में लगाया जाता है।आंकड़े पौधा मुख्यद्वार पर या घर के सामने हो तो बहुत शुभ माना जाता है। इसके फूल सामान्यत: सफेद रंग के होते हैं। विद्वानों के अनुसार कुछ पुराने आंकड़ों की जड़ में श्रीगणेश की प्रतिकृति निर्मित हो जाती है जो कि साधक को चमत्कारी लाभ प्रदान करती है। ज्योतिष के अनुसार जिस घर के सामने या मुख्यद्वार के समीप आंकड़े का पौधा होता है उस घर पर कभी भी किसी नकारात्मक शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके अलावा वहां रहने वाले लोगों को तांत्रिक बाधाएं कभी नहीं सताती। घर के आसपास सकारात्मक और पवित्र वातावरण बना रहता है जो कि हमें सुख-समृद्धि और धन प्रदान करता है। ऐसे लोगों पर महालक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है और जहां-जहां से लोग कार्य करते हैं वहीं से इन्हें धन लाभ प्राप्त होता है

तंत्र श्रेत्र में श्वेतार्क प्रजाति के मदार की बहुत उपयोगिता बताई गयी है। तीन चार वर्ष से अधिक पुराने वृक्ष की कुछ जड़ें लगभग गणेश जी की आकृति में प्रायः मिल जाती हैं सम्भव हो तो शुभ मुहूर्त में इसको विधिनुसार सावधानी से निकाल लें। यदि गणपति जी की आकृति स्पष्ट न हो तो किसी कारीगर से आकृति बनवाई भी जा सकती है। इसको अपने पूजा में रखकर नियमित पूजन- आराधना करने से त्रिसुखों की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में मदार की स्तुति इस मंत्र से करने का विधान है।


चतुर्भुज रक्तनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो, करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधि नामंराशि चू यडमीडे।

गणेशोपासना में लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन, लाल पुष्प, लाल चंदन, लाल रत्न-उपरत्न की माला से पूजन तथा नैवेद्य में गुड़ तथा भूंग के लड्डू अर्पण करके निम्न मंत्र का जप करें। देव की कृपा साधक को अवश्य ही मिलेगी। अगर आपके घर में हमेशा कलह का माहौल रहता है तो इसे दूर करने के लिए अपने घर के बाहर सफ़ेद आंकड़े का पौधा लगाए, ऐसा करने से आपके घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है।अक्षय तृतीया के शुभ दिन इसे अपने घर, दुकान, ऑफिस फैक्टरी आदि जगह पर लगाइए और अनुभव कीजिए इसके विघ्न विनाशक रिद्धि, सिद्धि दायक रहस्यमय प्रभाव को। यह पौधा बड़ा ही चमत्कारी एकाग्रता, स्वास्थ्य और उत्साह को देने वाला है। इसे अपने घर में रखने वाले पर भगवान शिव और भगवान गणेश की विशेष कृपा रहती है। इस पौधे में विशेष औषधीय गुण होते हैं।

1. सफेद आक के फूलों से शिव पूजन करें, भोले बाबा की कृपा होगी।

2. आक की जड़ रविपुष्य नक्षत्र में लाल कपड़े में लपेटकर घर में रख लें, घर में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहेगी।

3. श्वेतार्क के नीचे बैठकर प्रतिदिन साधना करें, जल्दी फल मिलेगा।

4. वृक्ष के नीचे बैठकर प्रतिदिन 'ऊँ गं गणपतये नमः' की एक माला जप करें, हर क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

5. श्वेतार्क की जड़, गोरोचन तथा गोघृत में घिसकर तिलक किया करें, वशीकरण तथा सम्मोहन में इससे त्वरित फल मिलेगा।

6. होलिका में श्वेतार्क की जड़ तथा छोटे से एक शंख की राख बनाकर रख लें। इससे नित्य तिलक किया करें, दुर्भिक्षों से रक्षा होगी।

7. श्वेतार्क से गणपति की प्रतिमा बनाकर घर में स्थापित करें। नित्य एक दूर्वाघास अर्पण कर श्रद्धापूर्वक गणपति जी का ध्यान किया करें, प्रत्येक कार्य में सफलता मिलेगी तथा सब प्रकार के विघ्नों से आपकी रक्षा होगी।

8. श्वेतार्क के पत्ते पर अपने शत्रु का नाम इसके ही दूध से लिखकर जमीन में दबा दिया करें, वह शांत रहेगा। इस पत्ते को जल प्रवाह कर दें तो शत्रु आपको छोड़कर और कहीं चला जाएगा। इस पत्ते से यदि होम करते हैं तब तो शत्रु का भगवान ही मालिक है ।

9. श्वेतार्क के फल से निकलने वाली रुई की बत्ती तिल के तेल के दीपक में जलाकर लक्ष्मी साधनाएँ करें, माँ की आप पर कृपा बनी रहेगी ।

10. श्वेतार्क की जड़, मूंगा, फिटकरी, लहसुन तथा मोर का पंख एक थैली में सिल लें। यह एक नजरबट्टू बन जाएगा। बच्चे के सोते समय चौंकना, डरना, रोना आदि में यह बहुत लाभदायक सिद्ध होगा।

11. सफेद आक की जड़, गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक नित्य 'ऊँ गं गणपतये नम' मंत्र से पूजा करें, सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होगी तथा मनोवांछित कामनाएं पूर्ण होंगी।

12. श्वेतार्क व़ृक्ष पर नित्य 'ऊँ नमो विघ्नहराय गं गणपतये नमः' मंत्र जप करते हुए मिश्रित जल से अर्ध्य दिया करें, दुष्ट ग्रह शांत होंगे।

13. सिंदूर मिश्रित चावल के आसन पर श्वेतार्क गणपति जी को विराजमान कर लें। हल्दी, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य से देव की पूजा करें। नित्य गणपति स्तोत्र का पाठ किया करें, धन-धान्य का अभाव नहीं रहेगा।

14. श्वेतार्क की जड़ 'ऊँ नमो अग्नि रूपाय ह्रीं नमः' मंत्र जपकर पास रख लें, यात्रा में दुर्घटना का भय नहीं रहेगा। आंकड़े की जड़ बहुत ही शुभ और पवित्र मानी जाती है। यह श्री यानी सुख-समृद्धि देती है, जिससे जीवन में असुरक्षा का भाव मिटता है और ईश्वर में आस्था बढ़ती है।

15. श्वेतार्क की समिधाओं में ' ऊँ जूं सः रुं रुद्राय नमः सः जूँ ऊँ' मंत्र जपते हुए हवन सामग्री होम किया करें रोग-शोक का नाश होने लगेगा। श्वेतार्क की जड़ से बानी माला से की गई साधना जल्दी सफल होती है

सावधानी - सफ़ेद आक के पौधे में विष होता है अंत इससे बनी औषिधियो का प्रयोग किसी अनुभवी वैद्य की  निगरानी में ही करे और सुरक्षित रहिये

'बैम्बू प्लांट ' ( Bamboo Plant ) घर में लगाएं, पैसों से लेकर लम्बी उम्र तक नहीं आएगी आपको कोई परेशान


 'बैम्बू प्लांट ' ( Bamboo Plant )

वैसे तो बांस से बनी बांसुरी वैदिक ज्योतिष और वास्तु शास्त्र का हिस्सा पुरातन समय से रही है लेकिन चाइनीज वास्तु फेंगशुई में भी बांस का महत्व उतना ही है। घर में बांसुरी होने का बड़ा महत्व माना गया है वास्तु में। वहीं फेंगशुई में 'बैम्बू प्लांट ' रखने की सलाह दी जाती है। ये भी वास्तु दोष और नेगेटिव एनर्जी को दूर करता है। बाँस, ग्रामिनीई (Gramineae) कुल की एक अत्यंत उपयोगी घास है भारतीय वास्तु में बांस से बनी चीजें घर में रखने की सलाह दी जाती है। घर के पूर्वी कोने या दक्षिण पुर्वी कोने में बैम्बू प्लांट रखने का विशेष महत्व है। ये पैसे, समृद्धि, लंबी उम्र, बिजनेस में फायदे जैसे सारे लाभ पहुंचाता है। बैम्बू प्लांट की खासियत ये है कि वो हर परिस्थिति में खुद को संभालकर रखता है। तूफानी मौसम में जब दूसरे पौधे गिर रहे होते हैं, टूट रहे होते हैं, तब ये पौधा बढ़ रहा होता है। बांस के पौधे सदाबहार और लंबी आयु वाले होते हैं। इसलिए इन्हें घर में रखा जाता है, वहां ये अपनी एनर्जी से आसपास का माहौल बदलते हैं। भारतीय संस्कृति में फेंग शुई बम्बू पिछले 4,000 से अधिक वर्षों से अच्छे भाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा हैं बैम्बू अपने आप में एक अद्भुत वस्तु है जो कि हमारे घर में बहुत ही शांतिपूर्ण और सकारात्मक ऊर्जा लाता है बैम्बू ये बात सिखाता है की अंदर से लचीला और खुला होने से कैसे हमारी भावनाएं हमारे शरीर में खुशी का प्रवाह करती हैं. हम इस फेंग शुई बैम्बू का पूरा फायदा केवल तभी प्राप्त कर सकते है जब वे घर में ठीक से रखा हों और उसका अच्छी तरह से ख्याल रखा हों


कितनी संख्या में रखें पौधे

 

फेंगशुई का मानना है कि विषम संख्या वाले पौधे सुख समृद्धि लाते हैं। 3, 5, 7 या 11 संख्या वाले बांस के पौधे सुखदायी होते हैं। 3 बांस खुशी के लिए, 5 बांस धन और समृद्धि पाने के लिए, 2 बांस के पौधे प्यार और शादी के लिए, 8 पौधे मान और सम्मान के लिए, 9 बांस के पौधे सौभाग्य के लिए शुभ माने गए हैं। इसलिए घर में नौ पौधों का समूह होना चाहिए, इसे लाल रिबन से बांधकर रखना चाहिए। कांच के जार या बाउल में पानी भर कर बैम्बू प्लांट रखना चाहिए।फेंग शुई बैम्बू धन को आकर्षित करने में सहायक होते हैं  घर में धन और समृद्धि के लिए फेंग शुई बैम्बू को घर में धन जहां पर रखा होता है वहां रखा जाना चाहिए

ऑफिस या स्टडी टेबल पर भी रख सकते हैं

 

फेंग शुई बम्बू घर या कार्यालय के लिए सबसे लोकप्रिय फेंगशुई इलाज में से एक इलाज हैं हम आजकल लगभग सभी फूलों की दुकानों में कई प्रकार के फेंग शुई बम्बू देख सकते हैं बैम्बू प्लांट को ऑफिस की टेबल पर दाहिनी और रखना शुभ माना गया है। इससे ये हमारे वर्क प्लेस पर बाहरी नेगेटिव एनर्जी का प्रभाव नहीं होता। आपके सामने बैठने वाले व्यक्ति पर आपका बेहतर असर होता है, वो आपकी बातों से प्रभावित होता है। अगर बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है या पढ़ाई में बहुत दिक्कतें आ रही हैं तो स्टडी टेबल पर बांस के पौधे रखने से सफलता मिलती है।

वैवाहिक जीवन में प्यार बढ़ाने के लिए

 

अगर आपकी शादीशुदा जिंदगी में कोई परेशानी है, पति-पत्नी में झगड़े होते हैं तो उनको अपने बेडरुम में दो बैम्बू प्लांट का जोड़ा रखना चाहिए। इन्हें रेशमी लाल रिबन से बांध कर ऐसी जगह रखें जहां से बिस्तर से इन्हें देखा जा सके। इससे आपके आपसी रिश्तों में तालमेल ठीक होगा। प्यार बढ़ेगा और झगड़े कम होंगे।

देवलोक का वृक्ष पारिजात या हरसिंगार ( Parizaat or Harsingaar )

इस खूबसूरत दुनिया में रंग-बिरंगे अनेक फूल मौजूद हैं जिनमें से एक खूबसूरत फूल पारिजात या हरसिंगार है ये उन प्रमुख वृक्षों में से एक है जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं ये फूल पवित्र और शुद्धता के प्रतीक माने जाते हैं इसलिए देवताओं को यह खूब भाते हैं परिजात के वृक्ष को दैवीय कहा जाता है धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं उन्हें प्रसन्न करने में भी पारिजात पुष्प का उपयोग किया जाता है "ओम नमो मणिंद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम:" मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाएँ और पूजा के इस नारियल व फूलों को लाल रंग कपड़े में लपेटकर घर के पूजा घर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती हैं। यह पूजा वर्ष के पाँच शुभ मुहर्त- होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होता है। यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं। अर्थात् वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है हिन्दू धर्म में इस वृक्ष को बहुत ही ख़ास स्थान प्राप्त है इसे प्राजक्ता, परिजात, हरसिंगार, शेफालिका, शेफाली, शिउली ,आर्बोर्ट्रिस्टिस (Arbor-tristis) भी कहा जाता है उर्दू में इसे गुलज़ाफ़री कहा जाता है पारिजात का वृक्ष बड़ा ही सुन्दर होता है जिस पर आकर्षक व सुगन्धित फूल लगते हैं यह सारे भारत में पैदा होता है। हरसिंगार फूल को ही ' रात की रानी ' का फूल भी कहते है हरसिंगार का यह वृक्ष रात की रानी के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि इसके पुष्प रात के समय खिलकर वातावरण को सुगंधित करते है तथा झड़ जाते है परिजात का फूल देखने में अलौकिक प्रतीत होता है पारिजात के वृक्ष की खासियत है कि जो भी इसे एक बार छू लेता है उसकी थकान चंद मिनटों में गायब हो जाती है। उसका शरीर पुन: स्फूर्ति प्राप्त कर लेता है।

पारिजात का वृक्ष दस से पन्द्रह फीट ऊँचा होता है। किसी-किसी स्थान पर इसकी ऊँचाई पच्चीस से तीस फीट तक भी होती है। विशेष रूप से पारिजात बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। इसके फूल बड़े ही आकर्षक होते हैं। इस वृक्ष की यह विशेषता भी है कि इसमें फूल बहुत बड़ी मात्रा में लगते हैं। चाहे फूल प्रतिदिन तोड़े जाएँ किंतु फिर भी अगले दिन फूल बड़ी मात्रा में लगते हैं। यह वृक्ष मध्य भारत और हिमालय की नीची तराइयों में अधिक पैदा होता है। इस वृक्ष की पत्तिया गुडहल के पत्तो की तरह चौड़ी होती है बगीचों या उद्यानों में लगा सफेद पुष्पों वाला झाड़ीदार ऊँचा वृक्ष अकस्मात ही मन मोह लेता है |आयु की दृष्टि से एक हज़ार से पाँच हज़ार वर्ष तक जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं जिसकी दुनिया भर में सिर्फ़ पाँच प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से एक ‘डिजाहाट’ है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट प्रजाति का है। इस पेड़ में सफेद रंग के फूल आते है और नारंगी रंग की डंडी रहती है. फूल में बहुत तेज खुशबू आती है रात को ही यह फूल खिलते हैं सुबह जब आप उठेंगे तो यह आपको नीचे जमीन पर गिरे हुए मिलेंगे वायु के साथ जब दूर से इन फूलों की सुगन्ध आती है तब मन बहुत ही प्रसन्न और आनन्दित होता है जिसमें साल में बस एक ही महीने में फूल खिलते हैं। पारिजात के वृक्ष में गंगा दशहरा के आसपास  फूल खिलते है इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1 प्रतिशत होता है, जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16 प्रतिशत पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1 प्रतिशत), मैनिटाल (1.3 प्रतिशत), एक राल (1.2 प्रतिशत), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और विटामिन ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं। यह पेड़ वर्ष में बस जून माह में फूल देता है। अगर इस वृक्ष की उम्र की बात की जाए तो वैज्ञानिकों के अनुसार यह वृक्ष 1 हजार से 5 हजार साल तक जीवित रह सकता है।

पारिजात के फूलों से जुडी रुक्मिणी और कृष्ण की प्रेम कहानी 

हरिवंशपुराण के अनुसार स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी परिजात के वृक्ष को छूकर ही अपनी थकान मिटाती थी लेकिन हैरानी की बात है जब पेड़ से फूल झड़ते हैं तो वे पेड़ के करीब नहीं, बहुत दूर जाकर गिरते हैं। परिजात के फूलों का यह स्वभाव भगवान कृष्ण और रुक्मिणी की प्रेम कहानी और सत्यभामा की जलन से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार नारद ऋषि इन्द्रलोक से इस वृक्ष के कुछ फूल लेकर कृष्ण के पास गए। कृष्ण ने ये फूल उनसे लेकर अपने निकट बैठी पत्नी रुक्मिणी को दे दिए। इस घटना के बाद नारद, कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा के पास गए और उनसे कहा कि परिजात के बेहद खूबसूरत फूल कृष्ण ने रुक्मिणी को सौंप दिए और उनके लिए एक भी नहीं रखा। यह बात सुनकर सत्यभामा ईर्ष्या से भर गईं और कृष्ण से जिद करने लगीं कि उन्हें परिजात का दिव्य वृक्ष चाहिए। परिजात का वृक्ष देवलोक में था, इसलिए कृष्ण ने उनसे कहा कि वे इन्द्र से आग्रह कर वृक्ष उन्हें ला देंगे। पति-पत्नी में झगड़ा लगाकर नारद, देवराज इन्द्र के पास गए और उनसे कहा कि मृत्युलोक से इस वृक्ष को ले जाने का षडयंत्र रचा जा रहा है लेकिन यह वृक्ष स्वर्ग की संपत्ति है, इसलिए यहीं रहना चाहिए। इतने में ही कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ इन्द्रलोक आए। पहले तो इन्द्र ने यह वृक्ष सौंपने से मना कर दिया लेकिन अंतत: उन्हें यह वृक्ष देना ही पड़ा।........ जब कृष्ण परिजात का वृक्ष ले जा रहे थे तब देवराज इन्द्र ने वृक्ष को यह श्राप दे दिया कि इस पेड़ के फूल दिन में नहीं खिलेंगे। सत्यभामा की जिद की वजह से कृष्ण परिजात के पेड़ को धरती पर ले आए और सत्यभामा की वाटिका में लगा दिया। लेकिन सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए उन्होंने कुछ ऐसा किया कि वृक्ष लगा तो सत्यभामा की वाटिका में था लेकिन इसके फूल रुक्मिणी की वाटिका में गिरते थे। इस तरह सत्यभामा को वृक्ष तो मिला लेकिन फूल रुक्मिणी को ही प्राप्त होते थे। यही वजह है कि परिजात के फूल,अपने वृक्ष से बहुत दूर जाकर गिरते हैं। परिजात के विषय में एक अन्य मान्यता, परिजात नामक राजकुमारी से जुड़ी है जो सूर्य देव से बहुत प्रेम करती थी। अथक प्रयास और तप के बावजूद जब सूर्यदेव ने परिजात का प्रेम स्वीकार नहीं किया तब क्रोध में आकर परिजात ने आत्महत्या कर ली। जिस स्थान पर परिजात की समाधि बनाई गई उस पर यह वृक्ष उग गया और तब से इस वृक्ष का नाम परिजात पड़ गया। शायद यही कारण है कि रात के समय इस वृक्ष को देखने से लगता है मानो यह रो रहा है और सूरज की रोशनी में खिलखिला उठता है। 

एक अन्य कथा के अनुसार, अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव अपनी माता कुंती के साथ कहीं जा रहे थे। उस समय उन्होंने सत्यभामा की वाटिका में यह वृक्ष देखा। कुंती ने अपने पुत्रों से इस वृक्ष को बोरोलिया में लगाने को कहा। तब से लेकर अब तक बाराबंकी का यह वृक्ष वहीं स्थित है। देशभर से लोग इस स्थान पर पूजा-अर्चना कर अपनी मन्नत मांगने और थकान मिटाने आते हैं। बाराबंकी स्थित परिजात का पेड़ अपने आप में बहुत रोचक है। लगभग 50 फीट के तने व 45 फीट की ऊंचाई वाले इस वृक्ष की अधिकांश शाखाएं मुड़कर धरती को छूती हैं।


पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है

पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग विविध प्रकार की औषधि आदि के रूप में भी किया जाता है पारिजात बावासीर रोग के निदान के लिए रामबाण औषधी है। इसके एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का लेप बनाकर गुदा पर लगाने से बवासीर के रोगी को राहत मिलती है। 

पारिजात पेड़ के पांच पत्ते तोड़ के पत्थर में पिस ले और चटनी बनाइये फिर एक ग्लास पानी में इतना गरम कीजिये की पानी आधा हो जाये फिर इसको ठंडा करके पीजिये तो बीस बीस साल पुराना गठिया का दर्द ठीक हो जाता है।

इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है।

 इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।

पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। पारिजात का फूल हल्का, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफ़नाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का भी इसमें विशेष गुण होता है।

अगर घुटनों की चिकनाई (Smoothness) हो गई हो और जोड़ो के दर्द में किसी भी प्रकार की दवा से आराम ना मिलता हो तो ऐसे लोग हारसिंगार पेड़ के 10-12 पत्तों को पत्थर पे कूटकर एक गिलास पानी में उबालें-जब पानी एक चौथाई बच जाए तो बिना छाने ही ठंडा करके पी लें- इस प्रकार 90 दिन में चिकनाई पूरी तरह वापिस बन जाएगी-अगर कुछ कमी रह जाए तो फिर एक माह का अंतर देकर फिर से 90 दिन तक इसी क्रम को दोहराएँ-निश्चित लाभ की प्राप्ति होती है।

इस के पत्ते को पीस कर गरम पानी में डाल के पीजिये तो बुखार ठीक कर देता है और जो बुखार किसी दवा से ठीक नही होता वो इससे ठीक होता है; जैसे चिकनगुनिया का बुखार, डेंगू फीवर, Encephalitis , ब्रेन मलेरिया, ये सभी ठीक होते है।

हरसिंगार के पत्तों के रस को अदरक के रस और शहद के सुबह-शाम सेवन करने से यकृत और प्लीहा (तिल्ली) की वृद्धि ठीक हो जाती है।

हरसिंगार के बीज को पानी के साथ पीसकर सिर के गंजेपन की जगह लगाने से सिर में नये बाल आना शुरू हो जाते हैं। जड़ो से नये बाल फूटने लगते है।



इन सारी औषिधियों में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में इसके पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता। इसलिए किसी अनुभवी वैध की सलाह लेकर ही इससे बनी औषिधियों का सेवन करना हितकारी रहेगा

700 साल के बीमार ' बरगद ' के पेड़ को चढ़ाई जा रही है ‘ड्रिप’

  

भारतीय ' बरगद ' के पेड़ तेज़ी से बढ़ने और मज़बूत जड़ों के लिए जाने जाते हैं वे इतनी तेज़ी से बढ़ते हैं कि उनकी जड़ें शाखों से गिरती हैं ताकि पेड़ को अतिरिक्त सहारा मिल सके दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य में 700 साल पुराना बरगद का पेड़ है जिसे एक ख़ास तरीके की 'ड्रिप' की बोतलें चढ़ाई जा रही है अभी तक आपने डॉक्टर्स को ही मरीज़ो को ड्रिप लगाते देखा होगा लेकिन पेड़ो को बचाने के लिए भी अब इस पद्धति का उपयोग किया जा रहा है इन बोतलों में एक विशेष कीटनाशक है जो दीमक के कीड़ों को दूर रखने के लिए है यह विशाल पेड़ लगभग तीन एकड़ में फैला हुआ है और ऐसा माना जाता है तेलंगाना के महबूब नगर जिले में स्थित बरगद का पेड़ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पेड़ है जहाँ ये पेड़ है वो एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है बरगद का यह पेड़ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र था। यहां दूर-दूर से पर्यटक इसे देखने आते थे इसकी देखभाल का जिम्मा पर्यटन विभाग को था। पर्यटन विभाग ने पेड़ के संरक्षण के लिए तमाम प्रयास किए लेकिन कोई भी प्रयोग उसे दीमकों से बचाने में सफल नहीं रहा। ये पेड़ बुरी तरह से दीमक की चपेट में आ चुका था पेड़ पर दीमक का प्रकोप इतना था कि वह इसे खोखला किए जा रहे हैं इसी कारण पेड़ का कुछ हिस्सा भी गिर चुका है  ऐसे में इंजेक्शन से डाल्यूटेड केमिकल्स लगाए जा रहे हैं ताकि दीमक खत्म किया जा सके जड़ों को भी पाइपों के ज़रिए बांध दिया गया है ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जाए लेकिन सब बेकार रहा था दुनिया भर में मशहूर पिल्लामर्री स्थित 700 साल पुराना यह पेड़ खत्म होने की कगार पर आ गया था  



लेकिन फिर इसे फिर से जीवित करने के लिए एक  कोशिश की गई पेड़ का इलाज करने के लिए पहले इसके तने में केमिकल डाला गया लेकिन यह नाकामयाब रहा। फिर वन विभाग ने फैसला लिया कि जिस तरह अस्पताल में मरीज को सलाइन में दवा मिलाकर बूंद-बूंद चढ़ाई जाती है वैसे ही पेड़ में बूंद-बूंद करके सलाइन की बोतल से केमिकल चढ़ाया जाए अधिकारियों ने सलाइन ड्रिप में केमिकल मिलाया। इस तरह से सैकड़ों बोतलें तैयार की गईं। इन बोतलों को पेड़ में हर दो मीटर की दूरी पर लटकाया गया। उसके बाद पेड़ में बूंद-बूंद करके यह ड्रिप चढ़ाई गई इस विशाल पेड़ को बचाने के लिए तीन तरह से इलाज और संरक्षण शुरू किया गया। पहले तरीके से संरक्षण करने के लिए पेड़ में सलाइन चढ़ाया जा रहा है। दूसरा पेड़ के जड़ों में केमिकल डायल्यूटेड पानी डाला जा रहा है। तीसरा तरीका पेड़ को सपॉर्ट के लिए अपनाया गया है। उसके आस-पास से कंक्रीट का स्ट्रक्चर बनाया गया है ताकि उसके भारी शाखाएं गिरने से बच सकें। पेड़ के तने को बचाने के लिए उसे पाइप्स और पिलर्स से सपॉर्ट दिया गया है। इसे उर्वरक और खाद भी मुहैया कराया गया  नतीजा वैज्ञानिको की ये मुहिम रंग ला रही और यह फॉर्म्युला काम कर रहा है। इस 700 सौ साल पुराने बरगद के पेड़ की खोई रंगत उसे वापिस मिल रही है अब पेड़ की हालत स्थिर है उम्मीद है कि उसे कुछ ही दिनों में सामान्य कर लिया जाएगा यहां पर्यटकों का आना फिर से शुरू किया जाएगा अब इस ड्रिप वाली तकनीक का इस्तेमाल अन्य पुराने पेड़ो को बचाने के लिए किया जा सकता है इस नई खोज के लिए के लिए वन विभाग के एक्सपर्ट्स और वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिक बधाई के पात्र है

स्वर्ग का फूल ( Udumbara )...... 3000 साल में सिर्फ एक बार खिलता है ये पवित्र फूल

स्वर्ग का फूल
दुनिया के कई इलाकों में एक ऐसा फूल पाया जाता है जिसे लेकर मान्यता है कि ये 3 हजार साल में एक बार दिखाई देता है। इस फूल का संस्कृत नाम Udumbara है जिसका मतलब है "स्वर्ग का फूल ''.......पिछले कई सालों में दुनियाभर में इसे देखे जाने का दावा किया गया है सबसे ताजा मामला 2007 का है जब चीन के डॉ.डिंग ने इस फूल को खोजा था। उनके गार्डन में 38 फूल का एक गुच्छा दिखाई दिया था ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले धरती पर ये फूल भगवान गौतम बुद्ध के जन्म के पहले दिखाई दिया था। इसके बाद 1997 में साउथ कोरिया के एक मंदिर में भगवान बुद्ध की मूर्ति पर ये ऊगा था। बौद्ध ग्रंथों में इस फूल को विशेष महत्व दिया गया है
  
इस फूल की खासियत ये है कि जहां पर भी ये ऊगता है वहां खुशबू फैल जाती है पर नंगी आंखों से इस फूल को देखा ही नहीं जा सकता है। इसे देखने के लिए मैग्निफाइंग लेंस या फिर माइक्रोस्कोप की जरूरत पड़ती है ........ऐसा भी माना जाता है कि ये फूल नहीं बल्कि lacewing insect के अंडे होते हैं पेड़ पर ये कीड़ा इन अंडों को देता है और फिर इसमें से फूलनुमा खुशबूदार चीज बाहर निकलती है वहीं बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक ये फूल सिर्फ पवित्र जगहों पर ऊगता है 'महायान 'जैसे बौद्ध धर्म के ग्रंथों में भी इस स्वर्ग के फूल का जिक्र है जहाँ भी ये फूल खिलता है बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए वो जगह तीर्थ स्थान बन जाती है और पता लगने पर वो इस फूल के दर्शन करने के लिए वो किसी भी कठिनाई को सहने के लिए तैयार रहते है